भारत में कैंसर के नए मामलों की संख्या 2050 तक 28 लाख तक पहुँच सकती है
4 मिनट में पढ़ें

भारत में कैंसर के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक हर साल लगभग 28 लाख नए मरीज सामने आ सकते हैं। यह आँकड़ा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) की GLOBOCAN 2022 रिपोर्ट पर आधारित है, जो देश की स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है।
वर्तमान स्थिति और भविष्य की भविष्यवाणी
IARC के GLOBOCAN 2022 अनुमानों के अनुसार, 2022 में भारत में 14.13 लाख नए कैंसर के मामले दर्ज हुए और 9.16 लाख लोगों की इस बीमारी से मृत्यु हुई। 2024 के नए अनुमानों में यह संख्या लगभग 16 लाख तक बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जनसंख्या वृद्धि और बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण 2050 तक सालाना नए मामलों की संख्या 28 लाख के करीब पहुँच सकती है।
उम्र‑सम्बंधी बदलाव: युवा भी जोखिम में
आकाश हेल्थकेयर के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी निदेशक डॉ. अरुण कुमार गिरी के अनुसार, कैंसर मरीजों की उम्र में स्पष्ट बदलाव देखा जा रहा है। अब 30‑40 वर्ष की आयु के लोग भी कैंसर के इलाज के लिए अस्पतालों में पहुँच रहे हैं। तंबाकू सेवन, खराब खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और प्रदूषण जैसे कारक इस जोखिम को बढ़ा रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल महानगरों तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी बढ़ रही है।
देर से पहचान: इलाज में जटिलता और लागत बढ़ती है
जुपिटर हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. प्रतीक पाटिल बताते हैं कि उनके पास आने वाले कई मरीज तीसरे या चौथे स्टेज में होते हैं। इस चरण में इलाज अधिक जटिल और महंगा हो जाता है। शरीर में गांठ, लगातार न ठीक होने वाला घाव, बिना कारण वजन घटना और असामान्य रक्तस्राव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार मरीज एक विशेषज्ञ से दूसरे विशेषज्ञ के पास जाते रहते हैं, जिससे सही जांच और इलाज में देरी होती है।
आपके लिए संबंधित खबरें
लिंग‑विशिष्ट स्क्रीनिंग की कमी
डॉ. विनीत मल्होत्रा के अनुसार, कई पुरुष तब तक जांच नहीं कराते जब तक लक्षण गंभीर न हो जाएँ। तंबाकू, शराब के अलावा, मूत्र और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर बात करने में झिझक भी इसका कारण है। वहीं, गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. अर्चना धवन बजाज बताती हैं कि महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए एचवीपी वैक्सीन और नियमित स्क्रीनिंग आवश्यक है, परन्तु कई महिलाएँ पैप स्मीयर या HPV टेस्ट नहीं करातीं। ब्रेस्ट में गांठ मिलने पर भी जांच टालना नुकसानदायक हो सकता है।
इलाज की आर्थिक बोझ
कैंसर की पहचान के बाद भी मरीजों को कई आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। रेडिएशन, सर्जरी और आधुनिक उपचार सुविधाएँ मुख्यतः बड़े शहरों में केंद्रित हैं। छोटे शहरों के मरीजों को कीमोथेरेपी या रेडिएशन के लिए बार‑बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। डॉ. प्रतीक पाटिल के अनुसार, अस्पताल के पास रहने, काम से छुट्टी लेने और यात्रा के खर्च के कारण कई परिवार कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। कुछ मरीज आर्थिक परेशानी के कारण इलाज बीच में छोड़ देते हैं।
मुख्य बातें
- IARC की GLOBOCAN 2022 रिपोर्ट के अनुसार 2022 में भारत में 14.13 लाख नए कैंसर मामले और 9.16 लाख मौतें हुईं।
- 2024 के अनुमान के अनुसार नए मामलों की संख्या लगभग 16 लाख तक बढ़ी है।
- विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक सालाना नए कैंसर मामलों की संख्या 28 लाख के करीब पहुँच सकती है।
- अब 30‑40 वर्ष के युवा भी कैंसर के रोगी बन रहे हैं; तंबाकू, खराब खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और प्रदूषण प्रमुख कारण हैं।
- बहुत से मरीज तीसरे या चौथे स्टेज में ही पहचान कराते हैं, जिससे इलाज की जटिलता और लागत बढ़ती है।
- पुरुषों में स्क्रीनिंग की कमी और महिलाओं में सर्वाइकल तथा ब्रेस्ट कैंसर की नियमित जांच न कराना प्रमुख समस्याएँ हैं।
- इलाज के लिए बड़े शहरों में यात्रा, रहने और कार्य से छुट्टी लेने के खर्च से कई परिवार कर्ज में फँसते हैं, और कुछ इलाज बीच में छोड़ देते हैं।
इन तथ्यों को देखते हुए, कैंसर के बढ़ते खतरे को कम करने के लिए समय पर स्क्रीनिंग, जागरूकता अभियानों और ग्रामीण‑शहरी क्षेत्रों में उपचार सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता स्पष्ट है।




टिप्पणियाँ
0