बाबा बागेश्वर के बयान से यूपी में सियासी उथल-पुथल, राम‑कृष्ण पोस्टर युद्ध और 2027 चुनाव की धूम
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बाबा बागेश्वर (पंडित धीरेंद्र शास्त्री) की भगवान श्रीकृष्ण को लेकर टिप्पणी के बाद उत्तर प्रदेश में सियासी तापमान तेज हो गया है। इस बयान को लेकर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, भाजपा के प्रवक्ता और कई संतों ने तीखी प्रतिक्रिया दी, जिससे चुनावी माहौल में धार्मिक प्रतीकों का उपयोग बढ़ा और 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति पर नई बहस छिड़ गई।
बाबा बागेश्वर का यूपी दौरा और तीन प्रमुख एपिसोड
बाबा बागेश्वर ने 17 नवंबर से 21 दिसंबर तक प्रतापगढ़, गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा में धार्मिक प्रवचन देने का कार्यक्रम तय किया है। इस कार्यक्रम को लेकर तीन प्रमुख घटनाएँ उभरीं:
पहला एपिसोड – कार्यक्रम की अनुमति पर विरोध
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से बाबा बागेश्वर के कार्यक्रम की अनुमति न देने की मांग की। उन्होंने आयोजकों को ‘ऐसे कथावाचकों से दूर रहने’ का आग्रह किया, जिन्हें उन्होंने ‘सस्ती लोकप्रियता के लिए अनर्गल बातें करने वाले’ कहा।
दूसरा एपिसोड – राम‑कृष्ण पोस्टर की टक्कर
लखनऊ में समाजवादी पार्टी कार्यालय के बाहर एक पोस्टर लगा, जिसमें लिखा है: “ना प्रभु राम तुम्हारे हैं, ना श्री कृष्ण हमारे हैं… राम और कृष्ण तो इस संसार के प्यारे हैं।” इसी समय भाजपा मुख्यालय के बाहर भी एक पोस्टर लगा, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को राम और योगी आदित्यनाथ को कृष्ण के रूप में दिखाया गया। दोनों पक्षों ने धार्मिक प्रतीकों को चुनावी संदेश के साथ जोड़कर जनता को प्रभावित करने की कोशिश की।
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तीसरा एपिसोड – संत समाज की विभाजित प्रतिक्रिया
बाबा बागेश्वर की टिप्पणी पर संतों में दो ध्रुवीकरण देखे गए। अनिरुद्धाचार्य, शैलेशानंद गिरि, इंद्रेश उपाध्याय आदि ने बागेश्वर के समर्थन में कहा कि उनका बयान ‘विनोद में कहा गया’ और राम‑कृष्ण दोनों एक ही हैं। वहीं कुछ अन्य संतों ने इसे ‘सनातन के अपमान’ कहा और बागेश्वर को ‘ज्ञान में पिछड़े’ कहा।
राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएँ
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने कहा कि भाजपा ऐसे एजेंट तैयार करती है जो चुनावी राज्यों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करते हैं। भाजपा प्रवक्ता हीरो वाजपेयी ने अखिलेश यादव को ‘सनातन विरोधी चेहरा’ कहा और कहा कि उनका विरोध अब आदत बन चुका है। उत्तर प्रदेश के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बागेश्वर के बयान को ‘गलत’ कहा और प्रदेशव्यापी आंदोलन की मांग की।
पोस्टर युद्ध के राजनीतिक संकेत
समाजवादी पार्टी के एक पोस्टर में अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ कृष्ण की बांसुरी और “27 में कृष्ण आएंगे” लिखा है, जिससे 2027 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत का संकेत दिया गया। भाजपा के पोस्टर में पीएम मोदी को राम और योगी को कृष्ण के रूप में दिखाते हुए कहा गया कि ‘जो राम लाए हैं वही कृष्ण लाएंगे’। दोनों पक्षों ने धार्मिक प्रतीकों को चुनावी संदेश के साथ मिलाकर वोटर बेस को आकर्षित करने की कोशिश की।
मुख्य बातें
- बाबा बागेश्वर ने 17 नवम्बर‑21 दिसम्बर तक उत्तर प्रदेश के कई शहरों में प्रवचन देने का कार्यक्रम तय किया।
- समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने कार्यक्रम की अनुमति न देने की मांग की और बागेश्वर को ‘सस्ती लोकप्रियता’ का साधन कहा।
- राम‑कृष्ण पोस्टर युद्ध शुरू, दोनों पक्षों ने धार्मिक प्रतीकों को चुनावी संदेश के साथ जोड़ा।
- संतों में बागेश्वर के बयान पर दो ध्रुवीकरण: समर्थन और विरोध दोनों।
- भाजपा और समाजवादी पार्टी ने 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर अपने‑अपने धार्मिक‑राजनीतिक रणनीति को उजागर किया।
आगे क्या हो सकता है?
उत्तरी प्रदेश में चुनावी माहौल गरम होने के साथ, दोनों प्रमुख पार्टियों (भाजपा और समाजवादी पार्टी) के लिए धार्मिक प्रतीकों का उपयोग एक नई रणनीति बन सकता है। यदि बागेश्वर का कार्यक्रम जारी रहता है, तो यह ध्रुवीकरण को और तेज कर सकता है, जिससे चुनावी परिणामों पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, संतों की विभाजित प्रतिक्रियाएँ भी सामाजिक‑धार्मिक समीकरणों को जटिल बना रही हैं।
नज़र रखी जाएगी कि क्या चुनाव आयोग इस प्रकार के धार्मिक‑राजनीतिक पोस्टरों को रोकता है और क्या बागेश्वर के कार्यक्रम में कोई प्रतिबंध लगाया जाता है।




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