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Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा पर खीर चांदनी में रखने की परंपरा कैसे शुरू हुई? जानें वो रहस्य

4 मिनट में पढ़ें

By Kishan kumar Jain• प्रकाशित 17 Oct 2026• अपडेट 17 Oct 2026
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Sharad Purnima 2026: शरद पूर्णिमा पर खीर चांदनी में रखने की परंपरा कैसे शुरू हुई? जानें वो रहस्य
शरद पूर्णिमा 2026 (25 अक्टूबर) को चंद्रमा की 16 कलाओं को मानते हुए खीर को चांदनी में रखने की प्राचीन परंपरा, उसके धार्मिक अर्थ और विभिन्न क्षेत्रों में इस रीति‑रिवाज के विविध…

शरद पूर्णिमा हिंदू कैलेंडर का एक प्रमुख तिथि है, जिसमें चंद्रमा की 16 कलाओं को पूर्ण मानते हुए कई धार्मिक रीति‑रिवाज निभाए जाते हैं। 2026 में यह तिथि 25 अक्टूबर को आएगी और इस अवसर पर खीर को चांदनी में रखने की प्राचीन परंपरा विशेष महत्व रखती है। इस लेख में हम इस रीति‑रिवाज की उत्पत्ति, धार्मिक मान्यताएँ और विभिन्न क्षेत्रों में इसके विविध रूपों को विस्तार से देखेंगे।

मुख्य बातें

  • शरद पूर्णिमा 2026 की तिथि: 25 अक्टूबर
  • परम्परा: दूध‑चावल से बनी खीर को चांदनी में रखना
  • धार्मिक मान्यता: चंद्रमा की 16 कलाएँ अमृत समान मानी जाती हैं
  • भगवान कृष्ण की महारास लीला से जुड़ाव
  • क्षेत्रीय विविधताएँ: महाराष्ट्र में कोजागिरी, गुजरात में गरबा, उत्तर भारत में खीर

शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा को वर्ष के सबसे दिव्य पूर्णिमाओं में गिना जाता है। इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण माना जाता है, और उसकी रोशनी को अमृत के समान माना जाता है। इस कारण लोग इस रात को विशेष पूजा‑पाठ, भजन‑कीर्तन और प्रसाद तैयार करते हैं।

चंद्रमा की 16 कलाएँ

धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि चंद्रमा की 16 कलाएँ उसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक गुणों को दर्शाती हैं। शरद पूर्णिमा की रात इन सभी कलाओं का समागम माना जाता है, जिससे इस रात की ऊर्जा विशेष रूप से शुद्ध और लाभकारी मानी जाती है।

खीर को चांदनी में रखने की परम्परा

परम्परा के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात खीर (दूध, चावल और मेवों से बनी मिठाई) को खुले आसमान में चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। माना जाता है कि रात भर चंद्रमा की किरणों में खीर को रखने से उसमें विशेष गुण आ जाते हैं और अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से शरीर को लाभ मिलता है।

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परम्परा की उत्पत्ति

यह रीति‑रिवाज चंद्रमा की पूजा और उसकी किरणों को अमृत मानने वाली धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है। पीढ़ियों से परिवार इस रात खीर बनाते, उसे चांदनी में रखते और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते आए हैं। कुछ क्षेत्रों में दूध या दूध‑आधारित पकवान को चंद्रमा को अर्पित करने की भी प्रथा है।

भगवान श्रीकृष्ण और शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी जोड़ा जाता है। ब्रज क्षेत्र में यह माना जाता है कि इस पूर्णिमा की रात कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था। इसी कारण इस रात को कृष्ण के 16 कलाओं से परिपूर्ण अवतार के रूप में भी देखा जाता है, जो चंद्रमा की 16 कलाओं के समानांतर है।

क्षेत्रीय विविधताएँ

शरद पूर्णिमा के अवसर पर विभिन्न राज्यों में अलग‑अलग रीति‑रिवाज देखे जाते हैं:

  • महाराष्ट्र: कोजागिरी पूर्णिमा पर मसाला दूध पीने की प्रथा है।
  • उत्तर भारत: अधिकांश घरों में खीर बनाकर चांदनी में रखी जाती है।
  • गुजरात: शरद पूर्णिमा के साथ गरबा नृत्य की परम्परा लोकप्रिय है।

शरद पूर्णिमा की रात खीर रखने की विधि

परम्परा के अनुसार खीर रखने की सामान्य प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • दूध, चावल और मेवे मिलाकर खीर तैयार करें।
  • रात के समय चंद्रमा का दर्शन करके छोटा पूजा स्थल स्थापित करें।
  • खीर को साफ, ढीले ढक्कन या महीन जाली से ढकें, ताकि धूल‑कीड़े न गिरें।
  • खीर को चांदनी में कुछ घंटे के लिए रखें।
  • अगली सुबह खीर को अच्छी तरह देख कर, प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।

धार्मिक मान्यताओं का सार

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की 16 कलाओं को अमृत मानने की मान्यता, खीर को चांदनी में रखने की परम्परा को आध्यात्मिक और शारीरिक लाभ के साथ जोड़ती है। यह रीति‑रिवाज न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करता है, बल्कि परिवारों में सांस्कृतिक एकता और परम्परागत भोजन को भी संरक्षित करता है।

यह लेख धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारी पर आधारित है; GBNews India इसकी पुष्टि नहीं करता।

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