सौ साल से जलता अखंड दीप: हरिद्वार के शांतिकुंज में अनोखी कहानी
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हरिद्वार के शांतिकुंज आश्रम में स्थित एक छोटा सा दीया, जो 1926 से लगातार जल रहा है, इस साल अपने शताब्दी वर्ष का जश्न मना रहा है। अखिल विश्व गायत्री परिवार इसे “अखंड दीप” कहता है और इसे न केवल धार्मिक प्रतीक, बल्कि धैर्य और लगन का जीवंत उदाहरण मानता है।
अखंड दीप की उत्पत्ति और शुरुआती साधना
दीये की कहानी आगरा जिले के आंवलखेड़ा गांव से शुरू होती है। 1926 में वसंत पंचमी के दिन 15 वर्ष के श्रीराम शर्मा (अब पं. श्रीराम शर्मा आचार्य) ने अपने घर में गाय के घी से यह दीया जलाया। उसी दिन उन्हें अपने गुरु स्वामी सर्वेश्वरानंद जी के दर्शन हुए और गुरु के निर्देश पर उन्होंने दीया जलाकर 24 साल तक गायत्री मंत्र की कठोर साधना शुरू की। इस दौरान उन्होंने प्रतिदिन 24 लाख बार मंत्र जपा और केवल जौ की रोटी व छाछ ही भोजन किया।
साधना के बाद का बड़ा यज्ञ
1958 में मथुरा में आयोजित एक विशाल गायत्री यज्ञ में लगभग पाँच लाख साधकों ने भाग लिया। इस यज्ञ के बाद गायत्री परिवार एक बड़े संगठन के रूप में स्थापित हुआ।
दीये के तीन ठिकाने
- आंवलखेड़ा (1926‑1953): दीया का पहला स्थान, जहाँ से साधना शुरू हुई।
- मथुरा (1953‑1971): गुरुदेव के आगमन के बाद दीया यहाँ ले जाई गई और 1953 में गायत्री तपोभूमि स्थापित हुई।
- हरिद्वार (1971‑वर्तमान): 20 जून 1971 को गुरुदेव और वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा ने दीया शांतिकुंज आश्रम में स्थापित किया। तब से यह दीया यहाँ निरंतर जल रहा है।
आज की देखभाल और मंत्र जप
शांतिकुंज में रहने वाली “देवकन्याएँ” बारी‑बारी से दीये के पास बैठकर गायत्री मंत्र का जप करती हैं। गायत्री परिवार के अनुसार, अब तक इस दीये के सामने 2400 करोड़ से अधिक बार मंत्र जपा जा चुका है। इस निरंतर जप के कारण दीया कभी नहीं बुझा।
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भक्तों का आकर्षण
शांतिकुंज में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु, पुरुष, महिलाएँ और बच्चे, इस दीये को देखने आते हैं। विशेषकर सुबह के समय यहाँ भीड़ रहती है। भक्तों का मानना है कि दीये का दर्शन मन को शांति और नई ऊर्जा प्रदान करता है। गुरुदेव ने इस दीये को शांतिकुंज की आत्मा कहा था और दो मुख्य सीखें – पवित्रता और प्रखरता – पर बल दिया।
शताब्दी समारोह और ज्योति कलश यात्रा
2026 में दीये के शताब्दी वर्ष के साथ दो और शताब्दियाँ जुड़ी हैं – गुरुदेव की साधना की शुरुआत और वंदनीया माताजी का जन्म, दोनों 1926 में हुए। इस अवसर पर अक्टूबर 2026 में शांतिकुंज से तीन ज्योति कलश रथ दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की ओर रवाना हुए। शताब्दी समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई प्रमुख व्यक्तियों ने भाग लिया। अगला बड़ा कार्यक्रम 31 अक्टूबर‑2 नवंबर को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित होगा।
मुख्य बातें
- अखंड दीप 1926 में आगरा के आंवलखेड़ा में जलाया गया।
- दीया ने तीन स्थानों पर यात्रा की: आंवलखेड़ा, मथुरा, हरिद्वार।
- श्रीराम शर्मा ने 24 साल तक 24 लाख बार गायत्री मंत्र जपा।
- आज शांतिकुंज में देवकन्याएँ निरंतर मंत्र जप करती हैं; 2400 करोड़ से अधिक जप दर्ज।
- हर दिन हजारों श्रद्धालु दीये का दर्शन करने आते हैं।
- 2026 में शताब्दी समारोह के साथ ज्योति कलश यात्रा भी शुरू हुई।
सौ साल में दुनिया में कई परिवर्तन हुए, लेकिन इस घी की लौ ने अपनी निरंतरता बनाए रखी। अखंड दीप आज भी धैर्य, लगन और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बना हुआ है, जो लोगों को शांति और शक्ति प्रदान करता है।




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