नाना पाटेकर: सिनेमा, समाजसेवा और संघर्ष की 75‑साल की कहानी
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बॉलीवुड के सबसे प्रभावशाली अभिनेता नाना पाटेकर का निधन 8 अक्टूबर को हुआ। रात लगभग ११ बजे पुणे में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनका जीवन सिनेमा, सेना, सामाजिक कार्य और व्यक्तिगत संघर्षों का अनूठा मिश्रण था, जिसे हम इस लेख में विस्तार से देखते हैं।
प्रारम्भिक जीवन और आर्थिक संघर्ष
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड‑जंजीरा में एक मराठी परिवार में हुआ। पिता टेक्सटाइल प्रिंटिंग का छोटा काम करते थे, माँ निर्मला एक गृहिणी थीं। 13 वर्ष की आयु में एक रिश्तेदार के धोखे से पिता का व्यवसाय बंद हो गया, जिससे परिवार दाने‑दाने पर निर्भर हो गया। नाना ने बचपन में ही सड़कों पर जेबरा क्रॉसिंग पेंट करने और सिनेमा पोस्टर चिपकाने का काम किया, जिसके बदले में उन्हें केवल 35 रुपये और एक भोजन मिलता था।
सिनेमा में कदम
मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से कमर्शियल आर्ट में डिप्लोमा करने के बाद, नाना ने मराठी रंगमंच में अभिनय शुरू किया। 1978 में मुजफ्फर अली की फिल्म गमन से उन्होंने बड़े पर्दे पर कदम रखा। बाद में परिंदा (1989), क्रांतिवीर (1994), अग्निसाक्षी (1996) और अब तक छप्पन (2004) जैसे फ़िल्मों में उनके किरदार ने राष्ट्रीय स्तर पर सराहना प्राप्त की। उन्होंने तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और चार फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीते।
मुख्य फ़िल्मी किरदार
- परिंदा (1989) – अन्ना सेठ, साइकोटिक गैंगस्टर
- क्रांतिवीर (1994) – प्रताप तिलक, फांसी के तख्ते पर भाषण
- अग्निसाक्षी (1996) – विश्वनाथ, सनकी पति
- अब तक छप्पन (2004) – साधु अगाशे, एनकाउंटर कॉप
- नटसम्राट (2016) – अप्पा बेलवलकर, अकेला शेक्सपियर अभिनेता
सेना और कारगिल में भागीदारी
1991 में फिल्म प्रहार की तैयारी में नाना ने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ कड़ी सैन्य प्रशिक्षण ली और उन्हें मानद कैप्टन की रैंक से सम्मानित किया गया। 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) के दौरान उन्होंने विशेष अनुमति लेकर सीधे सैनिकों के साथ बंकरों में दो महीने तक रहे, जिससे जवानों को हौसला मिला।
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समाजसेवा और नाम फाउंडेशन
नाना पाटेकर ने सामाजिक कार्य में भी गहरी रुचि दिखाई। 2015 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं के जवाब में उन्होंने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की स्थापना की। इस फाउंडेशन ने 1100 किमी से अधिक सूखी नहरों की गाद निकाली, विधवा किसान महिलाओं को आजीविका के साधन प्रदान किए और सैकड़ों गांवों को जल‑संकट से मुक्त किया। नाना अक्सर अपनी जेब से किसानों को लाखों रुपये दान करते थे, लेकिन उनका हिसाब सार्वजनिक नहीं किया जाता।
व्यक्तिगत जीवन और त्रासदियाँ
नाना की निजी जिंदगी कई दुखों से भरी रही। 28 वर्ष की आयु में पिता का दिल का दौरा पड़कर निधन हो गया, और बाद में दो भाई भी खो गए। उनका पहला बेटा दुर्वासा केवल ढाई साल की उम्र में गंभीर बीमारी से गुजर कर गुजर गया। बाद में उनका दूसरा बेटा मल्हार पाटेकर फिल्म प्रोडक्शन और निर्देशन में सक्रिय है। नाना ने अपनी पत्नी नीलकांति पाटेकर से अलग रहने का फैसला किया, लेकिन दोनों के बीच कोई सार्वजनिक विवाद नहीं हुआ।
विवाद और कानूनी मामलों
2018 में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008 की फिल्म हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर नाना पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया। पुलिस जांच में सबूतों की कमी के कारण मुंबई पुलिस ने उन्हें क्लीन चिट जारी की। इस घटना के अलावा नाना के बेबाक बयानों के कारण कई बार सार्वजनिक बहसों में उनका नाम आया।
पुरस्कार और सम्मान
- पद्म श्री (2013) – सिनेमा और कला में योगदान के लिए
- राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (3 बार) – परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी
- फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड (4 बार) – परिंदा, क्रांतिवीर, अंगार, अपहरण
- महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार – रंगमंच और मराठी सिनेमा में
मुख्य बातें
- नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र में हुआ
- आर्थिक कठिनाइयों के कारण बचपन में सड़कों पर काम किया
- 1978 में गमन से फिल्मी करियर शुरू
- परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी जैसे फ़िल्मों में राष्ट्रीय पुरस्कार जीते
- 1991 में मानद कैप्टन की रैंक से सम्मानित, 1999 में कारगिल में सैनिकों के साथ रहे
- 2015 में नाम फाउंडेशन की स्थापना, जल संरक्षण और किसान सहायता में सक्रिय
- 8 अक्टूबर को पुणे में अंतिम संस्कार, देशभर में श्रद्धांजलि
निष्कर्ष
नाना पाटेकर ने सिनेमा, सेना और सामाजिक कार्य में समान रूप से योगदान दिया। उनका जीवन संघर्ष, दृढ़ता और निःस्वार्थ सेवा का उदाहरण है। उनका निधन भारतीय सिनेमा और समाज दोनों के लिए एक बड़ी क्षति है, पर उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।




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