हिमाचल में 2002 की न्यूमोनिक प्लेग घटना: कारण, प्रभाव और रोकथाम
3 मिनट में पढ़ें

फरवरी 2002 में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के रोहड़ू इलाके में न्यूमोनिक प्लेग का प्रकोप हुआ, जिससे 16 रोगी और 4 मौतें दर्ज हुईं। इस घटना ने भारत में प्लेग के प्रति भय को फिर से उजागर किया और स्वास्थ्य प्राधिकरणों की त्वरित प्रतिक्रिया ने आगे के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रकोप की शुरुआत और विस्तार
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, प्रकोप 4 फरवरी 2002 को शुरू हुआ। 13 फरवरी को स्थानीय डॉक्टरों ने दिल्ली के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर कम्युनिकेबल डिजीज (NICD) को स्थिति की गंभीरता बताई। 19 फरवरी तक रोगी संख्या 16 तक पहुंच गई, जिसमें 4 मौतें शामिल थीं। जांच में येरसिनिया पेस्टिस (Plague bacillus) की उपस्थिति की पुष्टि हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह न्यूमोनिक प्लेग था।
पहली मौत और परिवार में संक्रमण
रिपोर्टों के अनुसार, रणधीर नामक व्यक्ति पहली मौत का शिकार हुआ। उसके बाद उसकी पत्नी पुष्पा, जो उत्तरांचल के चकराता इलाके की थीं, को रोहड़ू अस्पताल में लाया गया और चार घंटे में उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना से रोग का पड़ोसी राज्यों में फैलने की आशंका बढ़ गई। हाटकोटी गांव में एक महिला और उसके बेटे को भी बलगम में खून जैसे लक्षणों के साथ अस्पताल ले जाया गया।
स्वास्थ्य प्राधिकरणों की प्रतिक्रिया
रोहड़ू के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. राम लाल ने शुरुआती रोगियों को तुरंत एंटीबायोटिक दीं, जिससे कई जानें बच सकीं। 14 फरवरी को NICD की टीम प्रभावित इलाके पहुंची और येरसिनिया पेस्टिस से होने वाले न्यूमोनिक प्लेग की पुष्टि की।
आपके लिए संबंधित खबरें
रोकथाम उपाय
- रोगियों के संपर्क में आए लोगों, पड़ोसी गांवों के निवासियों, डॉक्टरों, पैरामेडिक्स और स्वास्थ्य कर्मियों को कीमोप्रोफिलैक्सिस (रोकथाम दवा) दी गई।
- प्रभावित गांवों के लिए अलर्ट जारी किया गया और जन जागरूकता अभियान चलाया गया।
- स्कूल बंद कर दिए गए और लोगों को घर में रहने की सलाह दी गई।
- जंगली चूहों को संभावित वाहक मानते हुए निगरानी बढ़ाई गई।
रूस में प्लेग शोधकर्ता की मौत और उसकी संभावित कड़ी
रूस की एंटी‑प्लेग लैब में काम करने वाली एक महिला शोधकर्ता की हालिया मौत ने फिर से प्लेग के प्रति चिंता बढ़ा दी। हालांकि, उसकी मृत्यु का सीधा कारण प्लेग नहीं बताया गया और शरीर में प्लेग बैक्टीरिया की पुष्टि नहीं हुई। फिर भी, एहतियाती तौर पर लैब के बड़े हिस्से को आइसोलेशन में रखा गया, जहाँ वह काम कर रही थी। यह घटना भारत में 2002 की न्यूमोनिक प्लेग घटना की याद दिलाती है, जहाँ त्वरित एहतियाती कदमों ने बड़े पैमाने पर प्रकोप को रोका था।
निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश में 2002 की न्यूमोनिक प्लेग घटना ने दिखाया कि समय पर पहचान, त्वरित एंटीबायोटिक उपचार और व्यापक जन जागरूकता से गंभीर संक्रामक रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है। वर्तमान में भी यदि प्लेग या समान रोगों के संकेत मिलें, तो स्वास्थ्य प्राधिकरणों को समान कदम उठाने चाहिए।
मुख्य बातें
- प्रकोप 4 फरवरी 2002 को शुरू, 19 फरवरी तक 16 मामले, 4 मौतें।
- NICD ने येरसिनिया पेस्टिस की उपस्थिति की पुष्टि की।
- डॉ. राम लाल की त्वरित एंटीबायोटिक दवा से कई जानें बचीं।
- कीमोप्रोफिलैक्सिस, अलर्ट, स्कूल बंद, जन जागरूकता अभियान लागू किए गए।
- रूस में प्लेग लैब शोधकर्ता की मौत ने फिर से प्लेग के प्रति सतर्कता बढ़ा दी, पर कारण अभी अनिश्चित है।




टिप्पणियाँ
0