छोटी दवा कंपनियों को चीन से मिल रहे ऑर्डर, लागत‑गुणवत्ता में नई चुनौतियां
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भारत की छोटी और मध्यम आकार की दवा कंपनियों ने हाल ही में सीपीएचआई वर्ल्डवाइड में एकत्रित होकर बताया कि चीन से कई औषधीय ऑर्डर अब भारत की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं। यह बदलाव पश्चिमी खरीदारों की सप्लाई‑चेन विविधीकरण की रणनीति का हिस्सा है, पर साथ ही कच्चे माल की लागत और गुणवत्ता‑सुरक्षा के सवालों को भी उजागर करता है।
सीपीएचआई वर्ल्डवाइड में भारतीय कंपनियों की भागीदारी
भारतीय औषधि निर्यात प्रोत्साहन परिषद (फार्मेक्सिल) द्वारा आयोजित भारत सरकार के मंडप में लगभग 40 छोटी और मध्यम आकार की दवा कंपनियों ने भाग लिया। प्रमुख प्रतिभागियों में सुपर्णा केमिकल्स, सिद्धार्थ इंटरनेशनल, रिनी लाइफ साइंस, सर्वाणी लैब्स, डेक्कन न्यूट्रास्यूटिकल्स, इंडिया फॉस्फेट एंड एलाइड इंडस्ट्रीज, अथुलिथा लैबोरेटरीज, रेइन लाइफसाइंस, रियोकेयर इंडिया और क्लेरियन ऑर्गेनिक्स शामिल थे।
ऑर्डर ट्रांसफर के मुख्य कारण
पश्चिमी खरीदारों ने चीन पर निर्भरता घटाने और सप्लाई‑चेन में लचीलापन लाने के लिए भारत को वैकल्पिक स्रोत के रूप में देखा। विशेष रूप से मध्यवर्ती उत्पाद (इंटरमीडिएट) और सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों को लागत‑लाभ के कारण प्राथमिकता मिल रही है।
क्लेरियन ऑर्गेनिक्स के विवेक तिवारी का दृष्टिकोण
क्लेरियन ऑर्गेनिक्स के निदेशक विवेक तिवारी ने बताया कि भारत में कच्चा माल अपेक्षाकृत सस्ता है और श्रम लागत भी कम है, जिससे मध्यवर्ती उत्पाद और एपीआई दोनों में लागत‑लाभ मिलता है। उन्होंने कहा कि अगले 20 वर्षों तक भारत और चीन अपनी‑अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बनाए रखेंगे। तिवारी ने यह भी उजागर किया कि उनकी कंपनी 1995 से कार्यरत है और अब एक सामान्य नाक खोलने वाली दवा में उपयोग होने वाला मध्यवर्ती उत्पाद चीन को निर्यात करती है, जिसे पहले वह चीन से आयात करती थी।
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अन्य कंपनियों की राय
ऑलकेम लाइफसाइंस के प्रबंध निदेशक बिपिन पटेल ने कहा कि यूरोप में उत्पादन लागत अधिक होने के कारण यूरोपीय खरीदार एशिया में अनुबंध विनिर्माण (सीडीएमओ) का काम देना चाहते हैं, पर उनकी प्राथमिकता अभी भी चीन ही है। लक्ष फाइनकेम के सीईओ भरत धनक ने बताया कि भारतीय कंपनियां चीन को पूरी तरह नहीं छोड़ रही हैं, बल्कि वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता विकसित कर रही हैं, जिससे दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी।
कच्चे माल की चीन पर निर्भरता और लागत‑गुणवत्ता की चुनौती
कई कंपनियों ने चेतावनी दी कि भारत अभी भी कच्चे माल के आयात में चीन पर निर्भर है। इस कारण लागत में अभी तक चीन के बराबर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहा है। साथ ही, गुणवत्ता‑सुरक्षा मानकों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता है, जिससे छोटे खिलाड़ियों के लिए बाधा उत्पन्न हो सकती है।
भविष्य की संभावनाएं
यदि भारतीय कंपनियां कच्चे माल की स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ कर लेती हैं और उत्पादन तकनीक में सुधार करती हैं, तो वे चीन के साथ प्रतिस्पर्धा में अधिक आत्मविश्वास हासिल कर सकती हैं। वर्तमान में, पश्चिमी बाजारों में लागत‑लाभ के कारण भारत को अवसर मिल रहा है, पर यह अवसर स्थायी बनाने के लिए निरंतर निवेश और नियामक समर्थन आवश्यक है।
मुख्य बातें
- सीपीएचआई वर्ल्डवाइड में 40 भारतीय एसएमई दवा कंपनियों ने भाग लिया।
- पश्चिमी खरीदारों की सप्लाई‑चेन विविधीकरण के चलते चीन से कई ऑर्डर भारत की ओर ट्रांसफर हो रहे हैं।
- भारत में कच्चा माल सस्ता है, पर अभी भी चीन पर आयात निर्भरता बनी हुई है।
- क्लेरियन ऑर्गेनिक्स ने चीन को निर्यात किया, जबकि अब अमेरिका से भी समान ऑर्डर मिल रहे हैं।
- यूरोपीय खरीदार एशिया में अनुबंध विनिर्माण को प्राथमिकता दे रहे हैं, पर प्राथमिक विकल्प अभी भी चीन है।
- भविष्य में लागत‑लाभ बनाए रखने के लिए स्थानीय कच्चे माल की आपूर्ति और गुणवत्ता सुधार आवश्यक है।




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