असदुद्दीन ओवैसी ने डेमोग्राफी कमेटी के धर्मवार डेटा पर किया तीखा हमला

केंद्र सरकार की हाई लेवल डेमोग्राफी कमेटी द्वारा धर्मवार आँकड़े माँगने को लेकर AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीखा हमला बोला है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि इस डेटा का प्रयोग मुसलमानों के खिलाफ नैरेटिव तैयार करने और उनके सामाजिक‑आर्थिक अधिकारों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें:

Related Update: बीजेपी ने बिहार और उत्तर प्रदेश की 10 विधान परिषद सीटों के लिए प्रत्याशियों का किया ऐलान

डेमोग्राफी कमेटी की मांगें

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, डेमोग्राफी कमेटी ने पिछले लगभग 15 वर्षों के दौरान जन्म पंजीकरण, वाहन पंजीकरण, स्कूल प्रवेश और संपत्ति लेन‑देन से जुड़ा धर्मवार डेटा मांगा है। इसके अलावा, जिलावार धार्मिक स्थलों की सूची, आधार, वोटर आईडी तथा राशन कार्ड पंजीकरण में असामान्य वृद्धि से जुड़ी जानकारी भी माँगी गई है।

विशेष रूप से मांगी गई जानकारी

  • किस धर्म के लोगों ने कितनी गाड़ियां खरीदीं।
  • किसके पास कितनी जमीन है।
  • आदिवासी समुदायों में धार्मिक रूपांतरण से जुड़ी खुफिया रिपोर्ट।
  • देश में संचालित डिटेंशन सेंटरों से संबंधित डेटा।

ओवैसी का विरोध

ओवैसी ने अपने ट्विटर पोस्ट में कहा, “जब हम मोदी सरकार से मुसलमानों की तालीमी, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर आँकड़े जुटाने की मांग करते हैं, तो सरकार झट से अपना मुँह फेर लेती है। अब वही कमेटी धर्म के आधार पर गाड़ी‑खरीद, जमीन‑स्वामित्व जैसी जानकारी माँग रही है।” उन्होंने इसे “मुसलमानों को निशाना बनाने की तैयारी” कहा।

पिछले विरोध के संकेत

ओवैसी से पहले कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी कमेटी की धर्मवार डेटा माँगने की रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। उन्होंने इसे “पूर्वाग्रह से ग्रसित” और “गलत” बताया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस मुद्दे पर कई राजनीतिक दलों में असहमति है।

मुख्य बातें

  • डेमोग्राफी कमेटी ने 15 सालों के धर्मवार डेटा, वाहन‑पंजीकरण, जमीन‑स्वामित्व आदि की मांग की।
  • ओवैसी ने इस डेटा को मुस्लिम‑समुदाय के खिलाफ नैरेटिव बनाने का इरादा बताया।
  • कांग्रेस के जयराम रमेश ने भी कमेटी की मांगों को पूर्वाग्रहपूर्ण कहा।
  • सरकार ने पहले मुस्लिम‑समुदाय की सामाजिक‑आर्थिक स्थिति पर आँकड़े जुटाने की मांग पर प्रतिक्रिया नहीं दी।

भविष्य की संभावनाएँ

डेमोग्राफी कमेटी की रिपोर्ट अभी तैयार नहीं हुई है, परन्तु यदि इस डेटा का उपयोग नीति‑निर्धारण में किया गया तो यह सामाजिक‑आर्थिक असमानताओं को उजागर कर सकता है। वहीं, यदि इसे राजनीतिक नैरेटिव में बदल दिया गया तो यह धार्मिक‑आधारित विभाजन को बढ़ा सकता है। इस संदर्भ में विपक्षी दलों और नागरिक समाज के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कमेटी के निष्कर्षों को किस तरह सार्वजनिक किया जाता है और किस उद्देश्य से उपयोग किया जाता है।

अंत में, इस मुद्दे ने फिर से यह सवाल उठाया है कि धर्मवार डेटा का संग्रह और उपयोग किस हद तक संवैधानिक अधिकारों और व्यक्तिगत गोपनीयता के साथ संतुलित होना चाहिए। यह बहस आगे भी जारी रहेगी, क्योंकि डेटा‑ड्रिवन नीति‑निर्धारण और धार्मिक‑आधारित राजनीति के बीच का संतुलन अभी भी अस्पष्ट है।

GB NEWS INDIA | Category: राजनीति

देखें वीडियो

       
Home Latest Contact Video Job