इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को फटकारा: अवैध हिरासत और दस्तावेज़ी त्रुटियों की गंभीर जांच
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस को अवैध हिरासत और फर्जी दस्तावेज़ीकरण के आरोपों पर कड़ी फटकार दी गई। कोर्ट ने कहा कि पुलिस “खुद का कानून चला रही है” और अधिकारियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की प्रक्रियाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ बताया।
केस की पृष्ठभूमि
23 अगस्त 2026 को नोएडा में दो पक्षों के बीच हिंसा की घटना हुई। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, नोएडा निवासी दीपक और चार अन्य व्यक्तियों को उसी शाम साढ़े सात बजे हिरासत में लिया गया। घटना के दो घंटे बाद, रात साढ़े नौ बजे संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई। याचिकाकर्ता को औपचारिक रूप से 24 अगस्त को दोपहर करीब तीन बजे गिरफ्तार दिखाया गया, जबकि वास्तविक में वह पहले ही पुलिस हिरासत में था।
दस्तावेज़ी त्रुटियाँ
हाईकोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के आधार पर तैयार किए गए दस्तावेज़ में कई गंभीर त्रुटियाँ थीं। जांच अधिकारी अनुज कुमार ने उस कागज पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन कागज का ऊपरी हिस्सा खाली छोड़ दिया गया था, जिससे बाद में गिरफ्तारी के कारणों को भरा जा सके। इसी प्रकार, सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) कमलेश कांत के हस्ताक्षर भी ऐसे ही अधूरे दस्तावेज़ पर थे। कोर्ट ने इन त्रुटियों को “दस्तावेज़ केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए तैयार किए गए” कहा।
कोर्ट का निर्णय और निर्देश
- हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की हिरासत को गैरकानूनी करार दिया और यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
- न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने एसीपी कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार को बीएनएसएस की प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ बताया।
- पुलिस महानिदेशक को बेहतर प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने का अनुरोध किया गया, जिससे अधिकारियों को नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके।
- एसीपी कमलेश कांत और अनुज कुमार के खिलाफ कोर्ट की नाराजगी को उनकी सेवा पुस्तिका में दर्ज करने का निर्देश दिया गया।
मुख्य बातें
- हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को “खुद का कानून चलाने” का आरोप लगाया।
- गिरफ्तारी के दस्तावेज़ में ऊपरी हिस्सा खाली छोड़कर बाद में भरने की कोशिश की गई।
- बीएनएसएस प्रक्रियाओं की अनभिज्ञता के कारण पुलिस की लापरवाही उजागर हुई।
- पुलिस प्रशिक्षण में सुधार और नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की सिफारिश की गई।
- एसीपी और जांच अधिकारी के खिलाफ सेवा पुस्तिका में फटकार दर्ज की जाएगी।
पुलिस की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि घटनास्थल पर तनावपूर्ण स्थिति और भीड़ मौजूद थी, इसलिए पुलिस ने स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए कदम उठाए थे। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि यह कारण पुलिस को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
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भविष्य की दिशा
इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने कार्यप्रणाली में सुधार लाने की आवश्यकता है। बीएनएसएस के तहत गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रियाओं का सख्त पालन, दस्तावेज़ीकरण में पारदर्शिता और अधिकारियों के प्रशिक्षण को सुदृढ़ करना आवश्यक माना गया है। यह निर्णय न केवल इस मामले में न्याय दिलाने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूरे राज्य में पुलिस-जनता संबंधों को सुधारने की दिशा में एक मील का पत्थर भी हो सकता है।




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