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उत्तर प्रदेश

सोनभद्र के 38 गांवों ने बचाए 2070 हेक्टेयर जंगल, शिफ्ट में देते हैं पहरा

2 मिनट में पढ़ें

By Kishan kumar Jain• प्रकाशित 13 Oct 2026• अपडेट 13 Oct 2026
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सोनभद्र के 38 गांवों ने बचाए 2070 हेक्टेयर जंगल, शिफ्ट में देते हैं पहरा
सोनभद्र जिले के 38 गांवों के 3500 से अधिक ग्रामीणों ने 15 साल पहले शुरू हुई पर्यावरण प्रहरी मुहिम से 2070 हेक्टेयर जंगल का संरक्षण किया और शिफ्ट में पहरा देकर अवैध…

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में आदिवासी समुदाय ने 15 साल पहले शुरू की गई पर्यावरण प्रहरी मुहिम को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है। इस पहल में 38 गांवों के 3500 से अधिक ग्रामीण शामिल हैं, जिन्होंने मिलकर 2070 हेक्टेयर जंगल का संरक्षण किया है।

मुख्य बातें

  • मुहिम 15 साल पहले शुरू हुई, अब 38 गांव और 3500+ लोग जुड़े हैं
  • कुल 2070 हेक्टेयर जंगल का संरक्षण किया गया
  • वन विभाग के वाचर के साथ शिफ्ट में पहरा दिया जाता है
  • अवैध कटान पर तुरंत कार्रवाई, पेड़ काटने वालों को चेतावनी दी जाती है
  • दुद्धी ब्लॉक के कर्री गांव में 80 परिवार इस कार्य में सक्रिय

जंगल संरक्षण की रणनीति

जंगल की निगरानी के लिए प्रत्येक गांव में वन विभाग के वाचर के साथ तीन-तीन ग्रामीण शिफ्ट में पहरा देते हैं। चरवाहे संदिग्ध गतिविधियों की सूचना तुरंत वन विभाग को देते हैं, जिससे त्वरित कार्रवाई संभव हो पाती है। रास्तों पर बैरियर लगाए गए हैं और अवैध कटान के मामलों में ग्रामीण मौके पर पहुंचकर पेड़ काटने वालों को कुल्हाड़ी छोड़ने की चेतावनी देते हैं। इस सख्त पहरेदारी के कारण अब पेड़ों की अवैध कटान में उल्लेखनीय कमी आई है।

दुद्धी ब्लॉक – कर्री गांव की पहल

दुद्धी ब्लॉक के कर्री गांव में लगभग 300 परिवार रहते हैं, जिनमें से 80 परिवार वन संरक्षण के कार्य में सक्रिय हैं। ग्राम स्वराज समिति ने 2011 में 20 हेक्टेयर जंगल से शुरू हुई मुहिम को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए आज 185 हेक्टेयर तक पहुंचा दिया है। यह विस्तार स्थानीय समुदाय की प्रतिबद्धता और सहयोग का परिणाम है।

पर्यावरणीय लाभ और सामाजिक प्रभाव

जंगल से ग्रामीणों को चूल्हे के लिए ईंधन, पशुओं के लिए चारा और टूटे हुए पेड़ों की टहनियों से घरों के लिए उपयोगी लकड़ी मिलती है। नई पौधरोपण वाली जगहों में पाँच साल तक मवेशियों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है, जिससे पौधों को नुकसान से बचाया जा सके। हालांकि, अवैध कटान का खतरा अभी भी बना हुआ है, इसलिए निरंतर निगरानी आवश्यक है।

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भविष्य की दिशा

स्थानीय समुदाय की इस पहल को देखते हुए, वन विभाग और सरकारी एजेंसियों को इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी लागू करने की सलाह दी जा रही है। सतत निगरानी, सामुदायिक भागीदारी और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली के माध्यम से जंगल संरक्षण को और मजबूत किया जा सकता है।

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