छुटनी महतो: डायन प्रथा के शिकार से लड़ते हुए महिलाओं का सहारा
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झारखंड के सरायकेला‑खरसावां जिले में एक आम के पेड़ के नीचे बैठी महिला का फोन बजना अक्सर एक महिला की मदद की पुकार बन चुका है। वह हैं छुटनी महतो, जो 1995 में खुद डायन प्रथा का शिकार हुईं और तब से इस प्रथा के खिलाफ लड़ते हुए सैकड़ों महिलाओं को न्याय दिला रही हैं।
डायन प्रथा का पहला अनुभव
1995 की गर्मियों में छुटनी की एक बच्ची बीमार पड़ गई। अस्पताल ले जाने के बजाय उसे ओझा के पास ले जाया गया, जहाँ बीमारी ठीक नहीं हुई। रोग के कारण गाँव के लोगों ने दोष छुटनी पर डाला और 3 अगस्त को पंचायत ने उन्हें “डायन” घोषित कर पाँच सौ रुपये का जुर्माना लगाया। उन्हें पीटा गया, घर से बाहर निकाल दिया गया और अपमानित किया गया। अगली रात वह अपने बच्चों के साथ अंधेरे में भागी और लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर बीरबांस में अपने भाई के घर पहुँचीं।
सहायता का पहला कदम
बचाव के लिए फ्री लीगल एड कमेटी (FLAC) के प्रेमचंद से मुलाकात हुई। यह संस्था 1991 से डायन प्रथा के खिलाफ काम कर रही थी। उन्होंने छुटनी को कानूनी सलाह दी और 1997 में बीरबांस में एक छोटा कार्यालय स्थापित करने में मदद की। इस कार्यालय से वह प्रभावित महिलाओं के लिए आश्रय स्थल बन गईं।
पद्मश्री से मान्यता
2021 में सरकार ने छुटनी महतो को पद्मश्री से सम्मानित किया। इस सम्मान के बाद भी उन्होंने कहा कि उनका काम पहले जैसा ही जारी रहेगा। उनका घर अब एक सहायता केंद्र बन गया है जहाँ महिलाएँ अपनी समस्याएँ बताती हैं और पुलिस, प्रशासन या कानूनी मदद की व्यवस्था की जाती है।
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सहायता के आँकड़े
रिपोर्टों के अनुसार, छुटनी ने अब तक 100‑150 महिलाओं की मदद की है। इन महिलाओं में से कई ने भी डायन प्रथा के शिकार होने के बाद उनकी मदद माँगी। उन्होंने अक्सर गाँव में जाकर परिवार, पड़ोसियों और स्थानीय अधिकारियों से बात की, आवश्यक होने पर पुलिस को बुलाया और पीड़ितों को रहने की जगह उपलब्ध कराई।
कानून और उसकी सीमाएँ
2001 में झारखंड में डायन प्रथा के खिलाफ विशेष कानून बनाया गया। हालांकि यह कानून प्रथा को कानूनी रूप से प्रतिबंधित करता है, लेकिन सामाजिक दबाव और जमीन‑जायदाद के झूठे आरोपों से महिलाओं पर अत्याचार जारी रहा। छुटनी का मानना है कि कानून के बावजूद जागरूकता और स्थानीय स्तर पर त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है।
परिवार का सहयोग
छुटनी की बहुएँ संगीता और अंजना अब उनके साथ प्रभावित गाँवों में जाती हैं और महिलाओं की मदद करती हैं। उनका बेटा अतुल, जो पास के सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं, भी माँ के संघर्ष को समझते हुए सामाजिक जागरूकता में योगदान देते हैं।
मुख्य बातें
- 1995 में छुटनी महतो को डायन घोषित कर पाँच सौ रुपये का जुर्माना लगाया गया।
- फ्री लीगल एड कमेटी ने उन्हें कानूनी सहायता प्रदान की और 1997 में बीरबांस में कार्यालय स्थापित किया।
- 2001 में झारखंड में डायन प्रथा के खिलाफ कानून बना, परन्तु सामाजिक दबाव जारी रहा।
- छुटनी ने अब तक 100‑150 महिलाओं की मदद की है, जिसमें कानूनी, आर्थिक और आश्रय सहायता शामिल है।
- 2021 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया, फिर भी वह 64 वर्ष की उम्र में भी गाँव‑गाँव जाकर मदद करती हैं।
भविष्य की दिशा
छुटनी महतो का संघर्ष यह दर्शाता है कि सामाजिक प्रथा के खिलाफ व्यक्तिगत साहस और सामुदायिक सहयोग मिलकर बदलाव ला सकते हैं। उनका संदेश है – “जब कोई पुकारे, तो जवाब देना हमारा कर्तव्य है”। उनके जैसे कार्यकर्ता और संस्थाएँ मिलकर ही डायन प्रथा को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।




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