अभिजीत दिपके ने तिरंगा मार्च प्रतिबंध पर सरकार की आलोचना की
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जंतर मंतर में आयोजित एक CJP (सिविल जस्टिस पर्सन) प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिजीत दिपके और अन्य वक्ताओं ने तिरंगा मार्च पर लगाए गए प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इस कदम को औपनिवेशिक शासन के समय की पाबंदी से तुलना की और इसे वर्तमान में लोकतंत्र के हनन के रूप में प्रस्तुत किया।
तिरंगा मार्च पर प्रतिबंध की मुख्य बातें
- वक्ताओं ने कहा कि तिरंगा लहराने पर पाबंदी उस समय थी जब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
- आज भी नरेंद्र मोदी सरकार के तहत समान प्रतिबंध लागू होने से लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रश्न उठते हैं।
- वक्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ज्ञानेश कुमार को तिरंगे से अधिक महत्वपूर्ण मान रही है।
- कथित तौर पर ज्ञानेश कुमार ने “वोट चोरी” में मदद की है, इस बात को भी उल्लेख किया गया।
वक्ताओं की प्रमुख टिप्पणी
अभिजीत दिपके ने कहा, “तिरंगा मार्च पर प्रतिबंध औपनिवेशिक काल की पाबंदी जैसा है, और यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।” अन्य वक्ताओं ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि तिरंगा एक राष्ट्रीय प्रतीक है और इसे लहराने की आज़ादी नागरिक अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है।
सरकार की प्रतिक्रिया की कमी
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं मिली। अभिजीत दिपके और अन्य वक्ताओं ने इस बात को उजागर किया कि बिना स्पष्ट कारण के प्रतिबंध लागू करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है।
मुख्य बातें
- जंतर मंतर में CJP प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित हुआ।
- अभिजीत दिपके ने तिरंगा मार्च प्रतिबंध को औपनिवेशिक पाबंदी से जोड़ा।
- वक्ताओं ने इसे लोकतंत्र के हनन के रूप में वर्णित किया।
- सरकार को ज्ञानेश कुमार को तिरंगे से अधिक महत्वपूर्ण मानने का आरोप लगाया गया।
- कथित “वोट चोरी” में ज्ञानेश कुमार की भागीदारी का उल्लेख किया गया।




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