उज्जैन महाअष्टमी पर 2100 साल पुरानी नगर पूजा का शुभारंभ, मदिरा अर्पित कर अनुष्ठान
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उज्जैन में शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी पर 2100 साल पुरानी ऐतिहासिक नगर पूजा का शुभारंभ हुआ। इस अनुष्ठान में चौबीस खंबा माता मंदिर में महामाया‑महालया को मदिरा अर्पित कर नगर के 40 से अधिक मंदिरों में पूजन‑पाठ किया गया, जिससे नगर में सुख‑शांति व समृद्धि की कामना की गई।
नगर पूजा का प्रारम्भ और मुख्य कार्यक्रम
सोमवार सुबह 8 बजे चौबीस खंबा माता मंदिर में कलेक्टर रोशन कुमार सिंह, एसपी प्रदीप शर्मा और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने विधि‑विधान से पूजा संपन्न कराई। पूजा की शुरुआत महामाया‑महालया को मदिरा का भोग अर्पित करके की गई। इसके बाद सरकारी अधिकारियों और कोटवारों का दल शहर के विभिन्न हिस्सों में स्थित देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों में आगे के अनुष्ठान के लिए रवाना हुआ।
पूजा‑पाठ का विस्तार
नगर पूजा के दौरान लगभग 27 किलोमीटर लंबी पथ पर स्थित 40 से अधिक मंदिरों में अनुष्ठान किया गया। इस आयोजन में 25 लीटर से अधिक मदिरा का उपयोग किया गया। पुजारी महेश गुरु के अनुसार, देवी‑भैरव मंदिरों में मदिरा के साथ दही, पूड़ी, भजिए और भीगे हुए गेहूँ‑चना (घूघरी) का भोग लगाया जाता है। हनुमान मंदिरों में नारियल, तेल, सिंदूर और ध्वज अर्पित किए जाते हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार सात्विक और तामसिक दोनों प्रकार की पूजन पद्धतियों का पालन किया गया।
धार्मिक मान्यताएँ और इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नगर पूजा की परंपरा का उद्गम सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल से है, अर्थात लगभग 2100 साल पहले। समय‑समय पर सिंधिया राज्य के दौर में भी यह अनुष्ठान जारी रहा और आजादी के बाद से प्रदेश शासन एवं प्रशासन द्वारा इसका निर्वहन किया जाता रहा है। माना जाता है कि इस अनुष्ठान से नगर में मौजूद अतृप्त आत्माओं को तृप्ति मिलती है, जिससे वे प्रसन्न होकर नगरवासियों को सुख‑शांति व समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
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आर्थिक पहलू
नगर पूजा का खर्च राज्य शासन और संबंधित अधिकारियों द्वारा वहन किया जाता है, जिससे यह परम्परा आज भी उज्जैन की धार्मिक‑सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बनी हुई है।
मुख्य बातें
- उज्जैन में महाअष्टमी पर 2100 साल पुरानी नगर पूजा शुरू हुई।
- पूजा का प्रारम्भ चौबीस खंबा माता मंदिर में महामाया‑महालया को मदिरा अर्पित कर हुआ।
- कुल 40 से अधिक मंदिरों में 27 किमी के मार्ग पर अनुष्ठान किया गया।
- पूजा में 25 लीटर से अधिक मदिरा, दही, पूड़ी, भजिए, घूघरी तथा हनुमान मंदिरों में नारियल‑सिंदूर अर्पित किया गया।
- सम्राट विक्रमादित्य के समय से चली आ रही यह परम्परा आज भी राज्य प्रशासन द्वारा समर्थित है।
यह अनुष्ठान उज्जैन के धार्मिक माहौल को समृद्ध करता है और नवरात्र के अष्टमी‑नवमी तिथियों में विशेष महत्व रखता है।




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