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12 साल से मरणासन्न बेटे को छोड़ नहीं सकते: सुप्रीम कोर्ट, पिता की याचिका पर अहम टिप्पणी

3 मिनट में पढ़ें

By Kishan kumar Jain• प्रकाशित 19 Dec 2025• अपडेट 19 Dec 2025
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12 साल से मरणासन्न हालत में पड़े युवक को नहीं छोड़ सकते: सुप्रीम कोर्ट, पिता की याचिका पर अहम सुनवाई नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट…

12 साल से मरणासन्न हालत में पड़े युवक को नहीं छोड़ सकते: सुप्रीम कोर्ट, पिता की याचिका पर अहम सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अत्यंत संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पिछले 12 वर्षों से मरणासन्न (Vegetative State) स्थिति में पड़े 31 वर्षीय युवक को इस हालत में यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। शीर्ष अदालत यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान कर रही थी, जिसमें युवक के पिता ने जीवन रक्षक चिकित्सा सहायता (Life Support) हटाकर उसे प्राकृतिक रूप से मृत्यु को स्वीकार करने की अनुमति देने की मांग की है।

AIIMS की मेडिकल रिपोर्ट को कोर्ट ने बताया दुखद

मामले की सुनवाई के दौरान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की ओर से प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में युवक की स्थिति को अत्यंत गंभीर और दुखद बताया गया है। कोर्ट ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है, जिसमें मानवीय संवेदना और कानूनी पहलुओं—दोनों पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।

जस्टिस पारदीवाला और विश्वनाथन की पीठ कर रही सुनवाई

इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ कर रही है। पीठ ने कहा कि युवक की मौजूदा स्थिति को देखते हुए अदालत इस मामले को हल्के में नहीं ले सकती और हर पहलू पर गहन विचार जरूरी है।

पिता की याचिका: जीवन रक्षक सपोर्ट हटाने की अनुमति मांगीयुवक के पिता ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में अनुरोध किया है कि उनके बेटे का इलाज रोककर उसे प्राकृतिक रूप से मृत्यु को स्वीकार करने दिया जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि युवक पिछले 12 वर्षों से मरणासन्न अवस्था में है और अब उसमें सुधार की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है।

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सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत रूप से मुलाकात का संकेत दिया

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह मामले को समझने के लिए युवक से स्वयं मुलाकात कर सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल कागजी रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि वास्तविक स्थिति को समझना भी आवश्यक है।

संवेदनशील मामलों में संतुलन की जरूरतयह मामला उन दुर्लभ और जटिल मामलों में शामिल है, जहां जीवन का अधिकार, गरिमा के साथ मृत्यु और नैतिक-कानूनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि जीवन रक्षक सहायता हटाने जैसे मामलों में प्रत्येक केस के तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

अगली सुनवाई पर नजरफिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अंतिम फैसला सुरक्षित नहीं रखा है और आगे की सुनवाई में सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा। देशभर की निगाहें इस संवेदनशील मामले पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका प्रभाव भविष्य में ऐसे मामलों के लिए कानूनी दिशा तय कर सकता है।

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