सोमालीलैंड में 3 साल तक पेट में रह गया ‘पत्थर का बच्चा’ – दुर्लभ लिथोपेडियन केस
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सोमालीलैंड में 42 साल की एक महिला के पेट से लगभग तीन साल बाद एक ‘पत्थर का बच्चा’ निकाला गया, जिससे चिकित्सा जगत में हलचल मच गई। महिला को लगातार पेट के नीचे तेज दर्द और भारीपन महसूस हो रहा था, जिसे वह सामान्य दर्द समझती रही। दर्द बढ़ने पर वह डॉक्टर के पास गई, जहाँ अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन ने एक कैल्शियम‑जमा हुआ भ्रूण दिखाया।
लिथोपेडियन (स्टोन बेबी) क्या है?
डॉक्टरों के अनुसार इस दुर्लभ स्थिति को ‘लिथोपेडियन’ या ‘स्टोन बेबी’ कहा जाता है। यह तब होता है जब गर्भ में विकसित हो रहा बच्चा गर्भाशय के बाहर पेट में ही रह जाता है और किसी कारण से उसकी मृत्यु हो जाती है। शरीर मृत भ्रूण को सोख नहीं पाता, इसलिए बचाव के लिए कैल्शियम की परत जमा कर देता है, जिससे वह पत्थर जैसा सख्त हो जाता है। इतिहास में पिछले चार सौ वर्षों में केवल 330‑340 ऐसे केस दर्ज हुए हैं।
केस की जाँच और उपचार
इंटरनेशनल मेडिकल केस रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के हवाले से पता चलता है कि डॉक्टरों ने महिला के पेट में कंकाल के साथ कैल्शियम की परत देखी। स्थिति गंभीर होने के कारण उन्होंने तुरंत सर्जरी का निर्णय लिया। कठिन ऑपरेशन के बाद भ्रूण को सुरक्षित रूप से निकाल लिया गया। ऑपरेशन के बाद महिला की तबीयत में तेज़ सुधार हुआ और छह महीने बाद की जांच में वह पूरी तरह स्वस्थ पाई गई, साथ ही पेट का दर्द भी समाप्त हो गया।
मुख्य बातें
- 42 वर्षीय महिला ने 3 साल तक पेट में दर्द और भारीपन महसूस किया।
- अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन में कैल्शियम‑जमा हुआ भ्रूण (लिथोपेडियन) दिखा।
- लिथोपेडियन की स्थिति में मृत भ्रूण के चारों ओर कैल्शियम की परत बनती है, जिससे वह पत्थर जैसा सख्त हो जाता है।
- ऐसे केस विश्व में पिछले 400 सालों में केवल 330‑340 दर्ज हुए हैं।
- डॉक्टरों ने कठिन सर्जरी के बाद भ्रूण को निकाल दिया; महिला 6 महीने बाद पूरी तरह स्वस्थ हुई।
- ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में समय पर सोनोग्राफी व इलाज न मिलने से ऐसे मामलों की पहचान देर से होती है।
विशेषज्ञों की टिप्पणी
विशेषज्ञों ने कहा कि लिथोपेडियन जैसी दुर्लभ स्थितियों में शुरुआती निदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और समय पर अल्ट्रासाउंड न होने से रोगी कई सालों तक दर्द सहते रहते हैं, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है। नियमित प्री‑नैटल चेक‑अप और तेज़ रेफ़रल सिस्टम इन मामलों को रोकने में मददगार हो सकते हैं।
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भविष्य की दिशा
इस केस ने स्वास्थ्य प्रणाली में अंतराल को उजागर किया है। स्वास्थ्य अधिकारी अब ग्रामीण क्षेत्रों में सोनोग्राफी यूनिट्स की उपलब्धता बढ़ाने और महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच कराने के लिए जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं।




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