मौत की सजा घटाने पर जस्टिस दत्ता की कड़ी टिप्पणी: सीमा तय करनी होगी
3 मिनट में पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस दीपांकर दत्ता ने हाल ही में एक हत्या के मामले में मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने के फैसले पर कोर्ट के ‘उदार’ रवैये की मौखिक रूप से आलोचना की। उन्होंने कहा कि अपराधों की बढ़ती संख्या के कारण न्यायालय को एक स्पष्ट सीमा तय करनी होगी।
केस की पृष्ठभूमि
जस्टिस दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने एक ऐसे मामले की सुनवाई की, जिसमें आरोपी को हत्या के आरोप में दोषी ठहराया गया था और उसने अपनी सजा कम करने की मांग की थी। इस दौरान जस्टिस दत्ता ने बताया कि पहले के समय में हत्या के मामलों में सजा ‘दुर्लभतम से दुर्लभ सिद्धांत’ के आधार पर तय की जाती थी, क्योंकि उस समय हत्या के अपराध कम होते थे। आज की स्थिति में यह सिद्धांत लागू नहीं रह गया है।
जस्टिस दत्ता द्वारा उद्धृत दो केस
जस्टिस दत्ता ने दो विशेष मामलों का उल्लेख किया:
- पहला केस: एक पिता ने अपनी बड़ी बेटी का बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी। बच्चों की मां की गवाही के आधार पर उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में सजा कम कर दी गई। फिर वही आरोपी बेल पर बाहर रहते हुए अपनी पत्नी की हत्या कर दी, ताकि गवाही देने वाले को बदला ले सके।
- दूसरा केस: छोटे बच्चों की गवाही के आधार पर पिता को मौत की सजा दी गई थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क बदलते हुए कहा कि उसने छोटे बच्चों की हत्या नहीं की थी, जिससे सजा में परिवर्तन हुआ।
जस्टिस दत्ता की मुख्य टिप्पणी
जस्टिस दत्ता ने कहा, “यह सुप्रीम कोर्ट के माफ करने वाले नेचर की वजह से है, भारत इसका सामना कर रहा है… यह सुप्रीम कोर्ट है। इसीलिए, हम कहते हैं, हमारे माफ करने वाले रवैये को कहीं न कहीं खत्म होना होगा।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि निरंतर सजा कम करने की प्रवृत्ति देश के अपराध दर को नियंत्रित करने में बाधा बन रही है और न्यायालय को एक स्पष्ट सीमा तय करनी होगी।
आपके लिए संबंधित खबरें
मुख्य बातें
- जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के उदार रवैये की मौखिक आलोचना की।
- उन्होंने कहा कि अपराधों की बढ़ती संख्या के कारण न्यायालय को सजा में सीमा तय करनी होगी।
- दत्ता ने दो केसों का उल्लेख किया जहाँ सजा में परिवर्तन हुआ, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में असंगति पर सवाल उठे।
- उनका मानना है कि निरंतर माफी की प्रवृत्ति को समाप्त करना आवश्यक है, ताकि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता बनी रहे।
न्यायिक दृष्टिकोण और भविष्य की दिशा
जस्टिस दत्ता की टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर सजा घटाने के मामलों में एक संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। भविष्य में न्यायालय संभवतः सजा निर्धारण में अधिक कठोर मानदंड अपनाएगा, जिससे अपराधियों को ‘माफ करने’ की प्रवृत्ति को सीमित किया जा सके।




टिप्पणियाँ
0