दीप्ति जीवनजी ने 400 मीटर टी20 में गोल्ड मेडल और एशियन पैरा गेम्स रिकॉर्ड बनाया
3 मिनट में पढ़ें

जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स 2026 में भारत ने एक और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 400 मीटर टी20 श्रेणी में दीप्ति जीवनजी ने 56.36 सेकंड का समय निकालकर न केवल प्रथम स्थान हासिल किया, बल्कि गेम्स रिकॉर्ड भी स्थापित किया। यह उनका एशियन पैरा गेम्स में दूसरा स्वर्ण पदक है; 2023 के हांगझोऊ एशियन पैरा गेम्स में भी उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था।
दीप्ति जीवनजी का संघर्ष और प्रारम्भिक जीवन
दीप्ति का जन्म तेलंगाना के वारंगल जिले के कल्लेड़ा गांव में हुआ। वे बौद्धिक विकलांगता के साथ पैदा हुईं और जन्म के समय सिर छोटा तथा चेहरे के असामान्य लक्षणों के कारण गांव वालों और रिश्तेदारों ने उनकी तुलना जानवरों से की। कई लोगों ने उनके माता-पिता को बच्ची को अनाथालय में छोड़ने की सलाह दी, परंतु उनके दिहाड़ी मजदूर माता-पिता ने उसे घर में ही पाला।
शिक्षा और खेल में पहचान
दीप्ति की जिंदगी में मोड़ तब आया जब उनके स्कूल के पी.ई.टी. शिक्षक बियानी वेंकटेश्वरलू ने उनकी दौड़ने की क्षमता को पहचाना। 9वीं कक्षा में उन्हें दौड़ना शुरू करने का अवसर मिला। बाद में ए.आई. कोच नागपुरी रमेश ने उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया। दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद के सुझाव पर उन्हें हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटी (NIEPID) में परीक्षण किया गया, जहाँ उन्हें पैरा-एथलीट के रूप में मान्यता मिली।
एशियन पैरा गेम्स 2026 में उपलब्धियां
दीप्ति ने 400 मीटर टी20 फाइनल में 56.36 सेकंड का समय दर्ज किया, जिससे वह न केवल स्वर्ण पदक जीत गईं, बल्कि इस श्रेणी में नया गेम्स रिकॉर्ड भी स्थापित किया। इस जीत से भारत का एशियन पैरा गेम्स में कुल स्वर्ण पदकों की संख्या बढ़ी।
आपके लिए संबंधित खबरें
अन्य भारतीय एथलीटों की उपलब्धियां
इसी प्रतियोगिता में प्रदीप कुमार ने जेवलिन थ्रो F53/F54 में सिल्वर मेडल जीता, जबकि टेबल टेनिस में भावना पटेल ने कांस्य पदक हासिल किया।
मुख्य बातें
- दीप्ति जीवनजी ने 400 मीटर टी20 में 56.36 सेकंड का समय निकालकर गोल्ड मेडल और एशियन पैरा गेम्स रिकॉर्ड बनाया।
- यह उनका एशियन पैरा गेम्स में दूसरा स्वर्ण पदक है; पहला 2023 हांगझोऊ में मिला था।
- दीप्ति का जन्म तेलंगाना के वारंगल जिले के कल्लेड़ा गांव में हुआ, जहाँ वे बौद्धिक विकलांगता के साथ पैदा हुईं।
- स्कूल के पी.ई.टी. शिक्षक और ए.आई. कोच ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और प्रशिक्षण दिया।
- हैदराबाद के NIEPID में परीक्षण के बाद उन्हें पैरा-एथलीट के रूप में मान्यता मिली।
दीप्ति जीवनजी की यह जीत न केवल व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी है, बल्कि भारत के पैरास्पोर्ट्स में बढ़ते कदमों का प्रतीक भी है। उनका उदाहरण कई विकलांग बच्चों के लिए प्रेरणा बन सकता है, जो सामाजिक बाधाओं के बावजूद अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।




टिप्पणियाँ
0