FCRA संशोधन विधेयक में वही प्रावधान: जेपीसी अध्यक्ष संजय जायसवाल का बयान
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जेपीसी के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने मंगलवार को FCRA (विदेशी अंशदान विनियमन) संशोधन विधेयक पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस बिल के प्रमुख प्रावधान वही हैं जो 2010 में यूपीए सरकार द्वारा पारित कानून में शामिल थे। यह बयान जेपीसी की लगातार चल रही बहस के बीच आया, जहाँ विभिन्न धार्मिक संगठनों ने अपने विचार रखे।
बिल की पृष्ठभूमि
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश हुआ और विपक्षी दलों की मांग पर 12 अगस्त को जेपीसी को भेजा गया। विपक्ष का तर्क है कि इस विधेयक के कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक‑संचालित NGOs और शैक्षणिक संस्थानों के वैध वित्त पोषण को बाधित करेंगे। सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि यह कोई धार्मिक भेदभाव नहीं, बल्कि विदेशी अंशदान को नियमन करने के उद्देश्य से है।
संजय जायसवाल का मुख्य बिंदु
जायसवाल ने स्पष्ट किया कि 2010 के कानून के तहत, यदि किसी NGO में अनियमितता पाई जाती है तो उसकी संपत्ति को जब्त करने का अधिकार केंद्रीय गृह सचिव और राज्य के प्रमुख सचिव को था। नई विधि में वही अधिकार एक नामित प्राधिकरण को देने का प्रस्ताव है। उन्होंने कहा, “जिस तरह 2010 के कानून के तहत यह अधिकार था, उसी तर्ज पर नए विधेयक में भी यही प्रावधान है।”
समुदायों की चिंताएँ
जेपीसी की बैठक में सिरो‑मालाबार चर्च, रामकृष्ण मठ, इस्कॉन और अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने बिल के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई। प्रमुख चिंताएँ थीं:
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- छोटे खर्चों को भी अकाउंट में दिखाने की आवश्यकता।
- अनियमितता पाए जाने पर संपत्ति की जब्ती का प्रावधान।
- बिल के संभावित पूर्वव्यापी असर की शंकाएँ।
गृह मंत्री अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि FCRA संशोधन विधेयक, 2026 का कोई भी पूर्वव्यापी असर नहीं होगा।
मुख्य बातें
- FCRA संशोधन विधेयक के प्रमुख प्रावधान 2010 के यूपीए‑कालीन कानून के समान हैं।
- संपत्ति जब्ती का अधिकार अब एक नामित प्राधिकरण को दिया गया है।
- विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश हुआ, 12 अगस्त को जेपीसी को भेजा गया।
- विपक्ष का दावा है कि बिल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है; सरकार ने इसे खारिज किया।
- गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि विधेयक का कोई पूर्वव्यापी असर नहीं होगा।
आगे का रास्ता
जेपीसी की अगली बैठक में इन चिंताओं पर विस्तृत चर्चा होगी और संभावित संशोधनों पर विचार किया जाएगा। यदि विधेयक को पारित किया जाता है, तो नामित प्राधिकरण को संपत्ति जब्ती का अधिकार मिलने से NGOs के वित्तीय प्रबंधन में नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इस बीच, विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने अपने हितों की रक्षा के लिए कानूनी उपायों की तैयारी की है।




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