बच्चों तक अश्लील कंटेंट की आसान पहुंच रोकने के लिए सख्त कानून की मांग
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देश में यौन अपराधों की बढ़ती संख्या के बीच अब रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करने की मांग तेज़ हो गई है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उदय माहुरकर (सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन) और पीपीआरआई की संस्थापक योगिता भयाना ने नाबालिगों को पोर्नोग्राफिक और अश्लील सामग्री तक पहुंच से बचाने के लिए सख्त और लागू करने योग्य कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया।
मुख्य प्रस्ताव
- समर्पित रोकथाम कानून: 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पोर्नोग्राफिक एवं यौन स्पष्ट सामग्री से बचाने हेतु नया कानून बनाना, जिसमें एज‑वेरिफिकेशन और प्लेटफ़ॉर्म उत्तरदायित्व को अनिवार्य किया जाए।
- सोशल‑मीडिया पर प्रतिबंध: नाबालिगों के सोशल‑मीडिया उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध की संभावना, जैसा कि ऑस्ट्रेलिया ने अपनाया है, पर गंभीर विचार करने का प्रस्ताव।
- ISP की कानूनी जवाबदेही: इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को अश्लील सामग्री के प्रसार की स्थिति में उत्तरदायी बनाना और AI‑आधारित कंटेंट डिटेक्शन एवं फ़िल्टरिंग लागू करना।
- ‘महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986’ में संशोधन: दोषी को 10 साल की जेल, जमानत न मिलने की व्यवस्था और संपत्ति जब्ती का प्रावधान जोड़ना।
उदय माहुरकर के तर्क
उदय माहुरकर ने बताया कि 2025 में 25 OTT प्लेटफ़ॉर्म के खिलाफ की गई कार्रवाई सही दिशा में कदम थी, परन्तु यह केवल प्रारम्भिक कदम है। उन्होंने कहा, “यदि नाबालिगों को यौन स्पष्ट सामग्री बिना किसी बाधा के मोबाइल तक पहुँचती है, तो रोकथाम की बात ही नहीं बनती।” उन्होंने 16 देशों में मौजूद नाबालिग‑सुरक्षा कानूनों का उल्लेख कर इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय अनुभव को उजागर किया।
योगिता भयाना का दृष्टिकोण
पीपीआरआई की संस्थापक योगिता भयाना ने कहा, “रेप के खिलाफ लड़ाई अपराध के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले शुरू होनी चाहिए।” उन्होंने बच्चों को ऐसी सामग्री से बचाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, जो उनकी समझ को विकृत कर सकती है। भयाना ने यह भी कहा कि मोबाइल फोन अब बच्चों की शिक्षा और संवाद का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, इसलिए जिम्मेदारी केवल माता‑पिता तक सीमित नहीं, बल्कि प्लेटफ़ॉर्म, टेक‑कंपनियों और नियामक संस्थाओं तक विस्तारित होनी चाहिए।
बॉलीवुड और सामाजिक प्रभाव
भयाना ने एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री, विशेषकर बॉलीवुड, को स्क्रीन पर महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन को सामान्य बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उनका मानना है कि इस प्रकार की प्रस्तुति युवा दिमागों में महिलाओं के प्रति अनादर को सामान्य बनाती है, जिससे यौन अपराधों की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
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मुख्य बातें
- नाबालिगों को पोर्नोग्राफिक कंटेंट से बचाने हेतु नया समर्पित कानून का प्रस्ताव।
- सोशल‑मीडिया पर नाबालिग प्रतिबंध की संभावना, ऑस्ट्रेलिया के मॉडल को संदर्भित।
- ISP को कानूनी जवाबदेही और AI‑आधारित फ़िल्टरिंग लागू करने की मांग।
- ‘महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986’ में कड़ी सजा और संपत्ति जब्ती का प्रावधान जोड़ना।
- बॉलीवुड की भूमिका पर सवाल, महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन को रोकने की अपील।
इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए विधायी प्रक्रिया, तकनीकी सहयोग और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता होगी। यदि सफल रहा, तो यह कदम नाबालिगों को यौन शोषण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।




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